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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

Angika

Posted by ssjha on September 13, 2006

नद्दी उफनी-उफनी कॆ शहर मॆं बहै छै

लहू अबॆ नस मॆं नै सङक पर बहै छै.

डार सुखलॊ प्यार के पत्ता झरी गेलै

बीयाबानॊ मॆं ऐन्हे जालिम हवा बहै छै.

धूरा-बवंडर मॆं लेबझैलॊ शहरॊ के पॊर

कोरे-कोर धोधैलॊ रेत बेसुमार बहै छै.

कन-कन ठार जिगर धुंध कोहासॊ सगर

जेहादी धार मॆं स्वर्ग व आजादी बहै छै.

छिरयैलै आतंकी आगिन झरखलै संसार

लॊर कश्मीर के संघरलै तॆ दुनिया दहै छै.

( कवि:कुंदन अमिताभ )

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मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो

Posted by ssjha on September 13, 2006

मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियाह रात चले
मरहम-ए-मुश्क लिए नश्तर-ए-अल्मास चले
बैन करती हुई, हंसती हुई, गाती निकले
दर्द का कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहां हाथों की राह तकने लगें
आस लिए
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुल्क़ुल-ए-मै
बहर-ए-ना-आसूदगी मचले तो मनाए न मने
जब कोई बात बनाए न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी सियाह सुनसान रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो
(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

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वन्दे मातरम्

Posted by ssjha on September 13, 2006

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम्॥
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥सप्त कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥

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क्या लिखूँ

Posted by ssjha on September 11, 2006

क्या लिखूँ
कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ
या दिल का सारा प्यार लिखूँ ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखू या सापनो की सौगात लिखूँ ॰॰॰॰॰॰
मै खिलता सुरज आज लिखू या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ ॰॰॰॰॰॰
वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सान्स लिखूँ
वो पल मे बीते साल लिखू या सादियो लम्बी रात लिखूँ
मै तुमको अपने पास लिखू या दूरी का ऐहसास लिखूँ
मै अन्धे के दिन मै झाँकू या आँन्खो की मै रात लिखूँ
मीरा की पायल को सुन लुँ या गौतम की मुस्कान लिखूँ
बचपन मे बच्चौ से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूँ
सागर सा गहरा हो जाॐ या अम्बर का विस्तार लिखूँ
वो पहली -पाहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ
सावन कि बारिश मेँ भीगूँ या आन्खो की मै बरसात लिखूँ
गीता का अॅजुन हो जाॐ या लकां रावन राम लिखूँ॰॰॰॰॰
मै हिन्दू मुस्लिम हो जाॐ या बेबस ईन्सान लिखूँ॰॰॰॰॰
मै ऎक ही मजहब को जी लुँ ॰॰॰या मजहब की आन्खे चार लिखूँ॰॰॰

कुछ जीत लिखू या हार लिखूँ
या दिल का सारा प्यार लिखूँ ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

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लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

Posted by ssjha on September 11, 2006

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

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झाँसी की रानी

Posted by ssjha on February 13, 2006

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में
, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कानपूर के नाना की
, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम
, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह
, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल
, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
,
सैन्य घेरना
, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में
,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में
,
चित्रा ने अर्जुन को पाया
, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

दित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई
,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई
,
रानी विधवा हुई
, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
,
डलहौज़ी ने पैर पसारे
, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी
, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी

राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में
, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर
, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध
, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले
, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
,
नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कुटियों में भी विषम वेदना

, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी
,
झाँसी चेती
, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ
, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर
, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत
, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी
, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा
, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली
, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा
, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई,, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार
,
विजयी रानी आगे चल दी
, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था
, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया
, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया
, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा
, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक
, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज
, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी
, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी
,
दिखा गई पथ
, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी
,
होवे चुप इतिहास
, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय
, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी
, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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कारवाँ गुज़र गया

Posted by ssjha on September 27, 2005

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से
,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
,
और हम खड़े
खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे!नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
,
पात
-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न
, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए
,
छंद हो दफन गए
,
साथ के सभी दिऐ धुआँधुआँ पहन गये
,
और हम झुकेझुके
,
मोड़ पर रुकेरुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।क्या शबाब था कि फूलफूल प्यार कर उठा

,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
,
एक दिन मगर यहाँ
,
ऐसी कुछ हवा चली
,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली
,
और हम लुटे-लुटे
,
वक्त से पिटे-पिटे
,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ
,
हो सका न कुछ मगर
,
शाम बन गई सहर
,
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखरबिखर
,
और हम डरे-डरे
,
नीर नयन में भरे
,
ओढ़कर कफ़न
, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे!माँग भर चली कि एक

, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं
, ठुमक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन
, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा
, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी
,
गाज एक वह गिरी
,
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
,
और हम अजान से
,
दूर के मकान से
,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया
, गुबार देखते रहे।-         गोपालदास नीरज

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