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Angika

Posted by ssjha on September 13, 2006

नद्दी उफनी-उफनी कॆ शहर मॆं बहै छै

लहू अबॆ नस मॆं नै सङक पर बहै छै.

डार सुखलॊ प्यार के पत्ता झरी गेलै

बीयाबानॊ मॆं ऐन्हे जालिम हवा बहै छै.

धूरा-बवंडर मॆं लेबझैलॊ शहरॊ के पॊर

कोरे-कोर धोधैलॊ रेत बेसुमार बहै छै.

कन-कन ठार जिगर धुंध कोहासॊ सगर

जेहादी धार मॆं स्वर्ग व आजादी बहै छै.

छिरयैलै आतंकी आगिन झरखलै संसार

लॊर कश्मीर के संघरलै तॆ दुनिया दहै छै.

( कवि:कुंदन अमिताभ )

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