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Archive for September, 2006

ऊँचाई

Posted by ssjha on September 27, 2006

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते
,
पौधे नहीं उगते
,
न घास ही जमती है।
          

 जमती है सिर्फ बर्फ,
 जो, कफन की तरह सफेद और,
  मौत की तरह ठंडी होती है।
  खेलती, खिल-खिलाती नदी,
  जिसका रूप धारण कर,
  अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे
,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे
,
अभिनन्दन की अधिकारी है
,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है
,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं
,
         

किन्तु कोई   वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
 ना कोई थका-मांदा बटोही,
 उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।                                                                         सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफि नहीं होती

,
सबसे अलग-थलग
,
परिवेश से पृथक
,
अपनों से कटा-बंटा
,
शून्य में अकेला खड़ा होना
,
पहाड़ की महानता नहीं
,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
         

जो जितना ऊँचा,
 उतना एकाकी होता है,
 हर भार को स्वयं ढोता है,
 चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
 मन ही मन रोता है।जरूरी यह है कि


ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य
,
ठूंट सा खड़ा न रहे
,
औरों से घुले-मिले
,
किसी को साथ ले
,
किसी के संग चले।
         

भीड़ में खो जाना,
 यादों में डूब जाना,
 स्वयं को भूल जाना,
 अस्तित्व को अर्थ,
 जीवन को सुगंध देता है।


धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें
,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें
,
         

 किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
  कि पाँव तले दूब ही न जमे,
   कोई कांटा न चुभे,
   कोई कलि न खिले।न वसंत हो

, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़
,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।
          मेरे प्रभु!
         

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
 गैरों को गले न लगा सकूँ,
 इतनी रुखाई कभी मत देना।

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दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

Posted by ssjha on September 13, 2006

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में
एक आईना था टूट गया देखभाल में

सब्र आ ही जाए गर हो बसर एक हाल में
इमकां एक और ज़ुल्म है क़ैद-ए-मुहाल में

आज़ुरदा इस क़दर हूं सराब-ए-ख़याल से
जी चाहता है तुम भी न आओ ख़याल में

तंग आ के तोड़ता हूं तिलिस्म-ए-ख़याल को
या मुतमईन करो कि तुम्हीं हो ख़याल में

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है
इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

उम्रर-ए-दो-रोज़ा वाक़ई ख़्वाब-ख़याल थी
कुछ ख़्वाब में गुज़र गई बाक़ी ख़याल में
(सीमाब अकबराबादी)

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आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से

Posted by ssjha on September 13, 2006

आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिसने इस दिल को परीख़ाना बना रखा था
जिसकी उल्फ़त में भुला रखी थी दुनिया हमने
दहर को दहर का अफ़साना बना रखा थाआशना हैं तेरे क़दमों से वह राहें जिन पर
उसकी मदहोश जवानी ने इनायत की है
कारवां गुज़रे हैं जिनसे इसी र’अनाई के
जिसकी इन आंखों ने बेसूद इबादत की है

तुझ से खेली हैं वह मह्बूब हवाएं जिन में
उसके मलबूस की अफ़सुरदा महक बाक़ी है
तुझ पे भी बरसा है उस बाम से मेह्ताब का नूर
जिस में बीती हुई रातों की कसक बाक़ी है

तू ने देखी है वह पेशानी वह रुख़सार वह होंट
ज़िन्दगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हमने
तुझ पे उठी हैं वह खोई खोई साहिर आंखें
तुझको मालूम है क्यों उम्र गंवा दी हमने

हम पे मुश्तरका हैं एह्सान ग़मे उल्फ़त के
इतने एह्सान कि गिनवाऊं तो गिनवा न सकूं
हमने इस इश्क़ में क्या खोया क्या सीखा है
जुज़ तेरे और को समझाऊं तो समझा न सकूं

आजिज़ी सीखी ग़रीबों की हिमायत सीखी
यास ओ हिर्मां के दुख दर्द के म’आनि सीखे
ज़ेर द्स्तों के मसाएब को समझना सीखा
सर्द आहों के, रुख़े ज़र्द के म’आनी सीखे

जब कहीं बैठ के रोते हैं वह बेकस जिनके
अश्क आंखों में बिलकते हुए सो जाते हैं
नातवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाब
बाज़ू तौले हुए मन्डलाते हुए आते हैं

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त
शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बह्ता है
आग सी सीने में रह रह के उबलती है न पूछ
अपने दिल पर मुझे क़ाबू ही नहीं रहता है
(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

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असर उसको ज़रा नहीं होता

Posted by ssjha on September 13, 2006

असर उसको ज़रा नहीं होता
रंज राह्तफ़ज़ा नहीं होतातुम हमारे किसी तरह न हुए
वरना दुनिया में क्या नहीं होता

नारसाई से दम रुके तो रुके
मैं किसी से ख़फ़ा नहीं होता

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

हाल-ए-दिल यार को लिखूं क्यूं कर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

दामन उसका जो है दराज़ तो हो
दस्ते आशिक़ रसा नहीं होता

किसको है ज़ौक़-ए-तल्ख़्कामी लैक
जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता

चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता

क्यों सुने अर्ज़-ए-मुज़्तर ऐ मोमिन
सनम आख़िर ख़ुदा नहीं होता
(मोमिन ख़ां मोमिन)

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किसी कली ने भी देखा न आंख भर के मुझे

Posted by ssjha on September 13, 2006

किसी कली ने भी देखा न आंख भर के मुझे
गुज़र गई जरस-ए-गुल उदास करके मुझे

मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्तां में
जगा के छोड़ गए क़ाफ़्ले सहर के मुझे

मैं रो रहा था मुक़द्दर की सख़्त राहों में
उड़ा ले गए जादू तेरी नज़र के मुझे

मैं तेरे दर्द की तुग़्यानियों में डूब गया
पुकारते रहे तारे उभर उभर के मुझे

तेरे फ़िराक़ की रातें कभी न भूलेंगी
मज़े मिल इन्हीं रातों में उमर भर के मुझे

ज़रा सी देर ठहरने दे ऐ ग़म-ए-दुनिया
बुला रहा है कोई बाम से उतर के मुझे

फिर आज आई थी एक मौज-ए-हवाए तरब
सुना गई है फ़साने इधर उधर के मुझे

(नासिर काज़मी)

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न गुल-ए-नग़्मा हूं न परदा-ए-साज़

Posted by ssjha on September 13, 2006

न गुल-ए-नग़्मा हूं न परदा-ए-साज़
मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज़तू और आराईश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं और अंदेशए-हाए-दूर-दराज़

लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली
हम हैं और राज़हाए सीना-ए-गुदाज़

हूं गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
वरना बाक़ी है ताक़त-ए-परवाज़

नहीं दिल में मेरे वह क़तरा-ए-ख़ूं
जिस से मिश्गां हुई न हो गुलबाज़

ऐ तेरा ग़मज़ा-ए-यक क़लम अंगेज़
ऐ तेरा ज़ुल्म-ए-सर बसर अंदाज़

तू हुआ जलवागर मुबारक हो
रेज़िश-ए-सिजदा-ए-जबीन-ए-न्याज़

मुझको पूछा तो कुछ ग़ज़ब न हुआ
मैं गरीब और तू ग़रीब नवाज़

असदुल्लाह ख़ां तमाम हुआ
ऐ दरेग़ा वह रिंद-ए-शाहिदबाज़
(ग़ालिब)

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बिछड़ गए तो फिर भी मिलेंगे हम दोनों एक बार

Posted by ssjha on September 13, 2006

बिछड़ गए तो फिर भी मिलेंगे हम दोनों एक बार
या इस बसती दुनिया में या इसकी हदों से पार

लेकिन ग़म है तो बस इतना जब हम वहां मिलेंगे
एक दूसरे को हम कैसे तब पह्चान सकेंगे
यही सोचते अपनी जगह पर चुप चुप खड़े रहेंगे

इससे पहले भी हम दोनों कहीं ज़रूर मिले थे
यह पहचान के नए शगूफ़े पहले कहां खिले थे

या इस बसती दुनिया में या इसकी हदों से पार
बिछड़ गए हैं मिल कर दोनों पहले भी एक बार
(मुनीर नियाज़ी)

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एक मोअ’म्मा है समझने का ना समझाने का

Posted by ssjha on September 13, 2006

एक मोअ’म्मा है समझने का ना समझाने का
ज़िन्दगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का

ख़ल्क़ कहती है जिसे दिल तेरे दीवाने का
एक गोशा है यह दुनिया इसी वीराने का

मुख़्तसर क़िस्सा-ए-ग़म यह है कि दिल रखता हूं
राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा है इस अफ़साने का

तुमने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग
आओ देखो ना तमाशा मेरे ग़मख़ाने का

दिल से पोंह्ची तो हैं आंखों में लहू की बूंदें
सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का

हमने छानी हैं बहुत दैर-ओ-हरम की गलियां
कहीं पाया न ठिकाना तेरे दीवाने का

हर नफ़स उमरे गुज़िश्ता की है मय्य्त फ़ानी
ज़िन्दगी नाम है मर मर के जिये जाने का
(फ़ानी बदायूनी)

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Angika

Posted by ssjha on September 13, 2006

नद्दी उफनी-उफनी कॆ शहर मॆं बहै छै

लहू अबॆ नस मॆं नै सङक पर बहै छै.

डार सुखलॊ प्यार के पत्ता झरी गेलै

बीयाबानॊ मॆं ऐन्हे जालिम हवा बहै छै.

धूरा-बवंडर मॆं लेबझैलॊ शहरॊ के पॊर

कोरे-कोर धोधैलॊ रेत बेसुमार बहै छै.

कन-कन ठार जिगर धुंध कोहासॊ सगर

जेहादी धार मॆं स्वर्ग व आजादी बहै छै.

छिरयैलै आतंकी आगिन झरखलै संसार

लॊर कश्मीर के संघरलै तॆ दुनिया दहै छै.

( कवि:कुंदन अमिताभ )

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मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो

Posted by ssjha on September 13, 2006

मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के सियाह रात चले
मरहम-ए-मुश्क लिए नश्तर-ए-अल्मास चले
बैन करती हुई, हंसती हुई, गाती निकले
दर्द का कासनी पाज़ेब बजाती निकले
जिस घड़ी सीनों में डूबते हुए दिल
आस्तीनों में निहां हाथों की राह तकने लगें
आस लिए
और बच्चों के बिलखने की तरह क़ुल्क़ुल-ए-मै
बहर-ए-ना-आसूदगी मचले तो मनाए न मने
जब कोई बात बनाए न बने
जब न कोई बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी सियाह सुनसान रात चले
पास रहो
मेरे क़ातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो
(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

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